नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल ने 175 से अधिक बच्चों की मिर्गी संबंधी सर्जरियाँ की हैं
अब यह 200 सर्जरियों के लक्ष्य की ओर अग्रसर है। यह भारत में बच्चों में दवा-प्रतिरोधी मिर्गी के उपचार हेतु एकमात्र एवं सबसे बड़ा कार्यक्रम है।

POSTED BY : ESHAWARI DT. 25/08/2026 📞 8828909982
इलाज के लिए की गई सर्जरी के बाद कम से कम एक साल तक नजर रखने पर 87% बच्चे पूरी तरह से दौरे-मुक्त पाए गए हैं। इसमें बच्चों में दवाओं से न ठीक होने वाली मिर्गी के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा देखरेख और हर बच्चे की जरूरत के हिसाब से सर्जरी की खास सुविधा दी जाती है/
मुंबई, 25 अगस्त 2026 : नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल ने बच्चों में दवा-प्रतिरोधी मिर्गी (ड्रग-रेजिस्टेंट एपिलेप्सी) के इलाज के लिए बने भारत के इकलौते और देश के सबसे बड़े समर्पित कार्यक्रम के तहत 175 से ट्रैक 200 पर अधिक पीडियाट्रिक एपिलेप्सी सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी कर ली हैं। अस्पताल में सर्जरी कराने वाले मरीजों में से 87% बच्चे एक साल की फॉलो-अप अवधि के बाद पूरी तरह से दौरे-मुक्त (सीज़र-फ्री) पाए गए हैं।
यह उपलब्धि भारत में इस बीमारी के इलाज में मौजूद बड़े अंतर को उजागर करती है। अनुमान के अनुसार, भारत की 0.8% बाल और किशोर आबादी मिर्गी से प्रभावित है। मिर्गी से पीड़ित अधिकांश लोगों को यह बीमारी बचपन में ही हो जाती है। मिर्गी से पीड़ित लगभग एक-तिहाई बच्चों में दवा-प्रतिरोधी मिर्गी पाई जाती है, जिनके लिए समय पर किसी विशेष मिर्गी केंद्र जाना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। एक अनुमान के मुताबिक भारत में 20 से 30 लाख लोग दवा-प्रतिरोधी मिर्गी के साथ जी रहे हैं, जिनमें से लगभग 10 लाख मरीज सर्जरी के जरिए ठीक होने के योग्य हो सकते हैं। हालांकि, इसके बावजूद वर्तमान में प्रति 1,000 योग्य मरीजों में से केवल 2 की ही सर्जरी हो पाती है, जो इलाज में मौजूद इसी बड़े अंतर को दर्शाता है।
नारायणा हेल्थ एसआरसीसी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल में इस एपिलेप्सी कार्यक्रम की शुरुआत डॉक्टरों की एक समर्पित टीम (डॉ. अनायता उड़वाडिया हेगड़े, प्रमुख, न्यूरोसाइंस विभाग, डॉ. प्राद्न्या गाडगिल, वरिष्ठ सलाहकार, पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी और डॉ. सौरव सामंतराय, वरिष्ठ सलाहकार, पीडियाट्रिक न्यूरोसर्जन) द्वारा भारत में पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी की उन्नत उप-विशेषज्ञताओं को विकसित करने के विजन के साथ की गई थी।
डॉ. अनायता उड़वाडिया हेगड़े, प्रमुख, न्यूरोसाइंस विभाग ने कहा, “भारत में बच्चों के लिए बेहतर न्यूरोलॉजी सुविधाओं की ज़रूरत आज सबसे ज़्यादा है। मिर्गी बच्चों में होने वाली सबसे आम दिमागी बीमारियों में से एक है, फिर भी इसके विशेषज्ञ इलाज तक लोगों की पहुँच कम है। जटिल न्यूरोलॉजी इलाज केवल एक डॉक्टर के भरोसे नहीं हो सकता, इसके लिए एक पूरी टीम और सही सुविधाओं की ज़रूरत होती है। इसके लिए एक ऐसा ढांचा चाहिए जहाँ अलग-अलग विशेषज्ञ डॉक्टर मिलकर, सही तकनीकों और तय नियमों के साथ काम करें।”
डॉ. प्राद्न्या गाडगिल, प्रमुख, कॉम्प्लेक्स पीडियाट्रिक एपिलेप्सी प्रोग्राम ने कहा, “बच्चों में मिर्गी के दौरों का रुकना या काबू में न आना बहुत खतरनाक स्थिति है। अचानक आने वाले दौरों से चोट या जान का खतरा तो रहता ही है, साथ ही बार-बार आने वाले दौरे और भारी दवाएं बच्चे के दिमागी विकास पर भी बुरा असर डालती हैं। इनमें से कई बच्चों की बीमारी को सर्जरी से ठीक किया जा सकता है, जिससे उनके दौरे पूरी तरह बंद हो सकते हैं। सही समय पर जांच करके ऐसे बच्चों की पहचान करना बहुत ज़रूरी है। वहीं अन्य बच्चों को भी सही समय पर ऑपरेशन से काफी फायदा मिल सकता है।”
डॉ. सौरव सामंतराय, वरिष्ठ सलाहकार, पीडियाट्रिक न्यूरोसर्जरी ने कहा, “मिर्गी की सर्जरी कोई एक साधारण ऑपरेशन नहीं है, बल्कि यह हर बच्चे की ज़रूरत के हिसाब से चुनी गई एक खास प्रक्रिया है। कुछ सर्जरी में दिमाग के उस हिस्से को हटाकर या ठीक करके दौरों को पूरी तरह खत्म किया जाता है, जबकि कुछ सर्जरी में दौरों के असर को कम करने की कोशिश की जाती है जब बीमारी का पूरी तरह ठीक होना मुश्किल हो। सही बच्चों का चुनाव करके सर्जरी करने से न केवल दौरे बंद या कम होते हैं, बल्कि बच्चे की सोचने-समझने की क्षमता और दिमागी विकास में भी सुधार होता है। यानी इसके फायदे सिर्फ दौरे रोकने तक सीमित नहीं हैं। लेकिन ऐसे बेहतर नतीजे केवल एक अनुभवी और समर्पित मेडिकल टीम के ज़रिए ही मुमकिन हैं, अकेले किसी न्यूरोसर्जन से नहीं।”
इस कार्यक्रम के नीचे दिए गए मामले दर्शाते हैं कि सही समय पर सर्जरी का मूल्यांकन क्या हासिल कर सकता है:
रोहन (बदला हुआ नाम) – 6 वर्ष: जब रोहन 2 साल का था, तब उसे रोजाना अचानक गिरने वाले दौरे (ड्रॉप अटैक्स) आने लगे थे। अगले दो से तीन वर्षों में, उसने पढ़ने, लिखने और अन्य बच्चों के साथ घुलने-मिलने की क्षमता खो दी। जब कई दवाएं भी उसके दौरों को नियंत्रित करने में विफल रहीं, तो उसकी कॉर्पस कलोसोटॉमी सर्जरी की गई। अगले ही दिन उसके गिरने वाले दौरे (ड्रॉप अटैक्स) बंद हो गए। आने वाले महीनों में, फिजियोथेरेपी और ऑक्यूपेशनल थेरेपी की मदद से उसने फिर से कविताएं सुनाना और अक्षर व संख्याएं लिखना शुरू कर दिया।
प्रतीक (बदला हुआ नाम) – 20 के दशक के अंत में: प्रतीक जब साढ़े तीन साल का था, तभी से उसे रात में बहुत भयानक दौरे आते थे। 23 सालों तक कई जगह इलाज कराने के बाद भी उसकी बीमारी पकड़ में नहीं आई, जिससे वह और उसका परिवार रात-रात भर जागने को मजबूर रहता था। जब वह एसआरसीसी अस्पताल आया, तो जांच में पता चला कि उसके दिमाग में बचपन से ही एक खराबी थी, जो 20 साल से भी ज़्यादा समय से पकड़ी नहीं जा सकी थी। डॉक्टर ने ऑपरेशन करके उस हिस्से को बाहर निकाल दिया। सर्जरी की पहली ही रात के बाद से उसे एक भी दौरा नहीं आया। अब लगभग छह महीने हो चुके हैं, वह पूरी तरह ठीक है और आम लोगों की तरह सामान्य जीवन जी रहा है।
मिथिला (बदला हुआ नाम) – 10 वर्ष (रत्नागिरी): रत्नागिरी की 10 वर्षीय मिथिला को जन्म से पहले दिमाग में हुई गंभीर क्षति के कारण बचपन से ही रोजाना दौरे आते थे। अन्य केंद्रों ने कह दिया था कि इस मामले में कुछ खास नहीं किया जा सकता। उसके दाहिने हिस्से में कमजोरी और बढ़ने के जोखिम के बावजूद, उसकी हेमिस्फेरेक्टॉमी की गई, जिससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्से को स्वस्थ हिस्से से अलग कर दिया गया। तीन महीने बाद, वह पूरी तरह से दौरा-मुक्त है और रिहैबिलिटेशन की मदद से पहली बार बिना किसी सहारे के चल पा रही है और बोल पा रही है।
राज (बदला हुआ नाम) – 12 वर्ष: राज को जन्म के समय दिमाग में चोट लगी थी। शुरुआत में इससे उसके दिमागी विकास पर कोई असर नहीं पड़ा और वह चार साल की उम्र तक फुटबॉल भी खेलता था। लेकिन समय के साथ दौरों के गंभीर होने और ईईजी रिपोर्ट खराब होने के कारण वह लगभग बिस्तर पर आ गया और उसकी बोली पूरी तरह बंद हो गई। इलाज के विकल्पों के बारे में जागरूकता की कमी के कारण उसकी सर्जरी में लगभग एक साल की देरी हुई। कॉर्पस कलोसोटॉमी सर्जरी के बाद उसके गिरने वाले दौरे (ड्रॉप अटैक्स) पूरी तरह बंद हो गए। छह महीने बाद, वह बिना किसी सहारे के चल रहा है और अच्छे से बात कर रहा है।
सोनम (बदला हुआ नाम) – साढ़े पांच वर्ष: सोनम एक दुर्लभ हाइपोथैलेमिक हैमार्टोमा के कारण रोज़ाना “हंसने वाले दौरों” (लाफिंग सीज़र्स) से पीड़ित थी। यह दिमाग में काफी गहराई में स्थित एक गाँठ होती है, जहाँ पारंपरिक ओपन न्यूरोसर्जरी तकनीकों से पहुँचने पर गंभीर जटिलताओं का उच्च जोखिम रहता है। उसकी स्टीरियोटैक्टिक रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन की गई, जो एक मिनिमली इनवेसिव प्रक्रिया है। सर्जरी के कुछ ही घंटों के भीतर वह होश में आ गई, बिना किसी जटिलता के खाना खाने लगी और उसके दौरे पूरी तरह से बंद हो गए।
3.5 वर्षों में 175 से अधिक पीडियाट्रिक एपिलेप्सी सर्जरी का सफल अनुभव एक स्पष्ट संदेश देता है: मिर्गी को एक ऐसी बीमारी नहीं बनने देना चाहिए जिस पर बात ही न हो, खासकर तब जब दवाओं के बावजूद बच्चे को दौरे आते रहें। भारत में दवा-प्रतिरोधी मिर्गी से पीड़ित बच्चों का इलाज करने वाले बहुत कम विशेषज्ञ केंद्र हैं, ऐसे में यह आंकड़े बेहद जटिल मामलों में मिले व्यापक अनुभव को दर्शाते हैं। बीमारी की समय पर पहचान, सही विशेषज्ञ के पास रेफरल और उन्नत इलाज तक पहुँच ही वर्षों तक अनियंत्रित दौरों से पीड़ित रहने और बच्चे के फिर से पढ़ाई, विकास व सामान्य जीवन में लौटने के बीच का अंतर तय करती है।





