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नैशनल बर्न्स सेंटर ने बड़ी तादाद में लोगों से स्किन डोनेशन के लिए आगे आने और मरीज़ों की जान बचाने का किया आह्वान  

बता दें कि आग में झुलस जाने वाले लगभग 70% मरीज़ों की उम्र 15 से 35 साल के बीच होती है।

 

POSTED BY : MRUNALI SAKPAL DATED ON 23/04/2026 ( 8850212023 )

मुम्बई, ( NHI.IN) : द नैशनल बर्न्स सेंटर (NBC) ने हाल ही में देश भर में स्किन डोनेशन‌ की‌ भारी कमी से जुड़े एक बेहद अहम पहलू को रेखांकित किया स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सेंटर सालों से स्किन डोनेशन को बढ़ावा देने के लिए पूरी तरह से प्रयासरत है । इस मसले‌ पर नैशनल बर्न्स सेंटर के‌ डायरेक्टर और प्लास्टिक सर्जन डॉ। सुनील केसवानी ने स्किन डोनेशन और मरीज़ों की आवश्यकताओं की पूर्ती में भारी अंतर को लेकर लोगों में जागरुकता की कमी का विशेष रूप से उल्लेख किया। ग़ौरतलब है कि मुम्बई में स्किन बैंकों को हर साल आवश्यकता के उलट महज़ 25% स्किन डोनेशन ही हासिल हो पाता है।

बता दें कि आग में झुलस जाने वाले लगभग 70% मरीज़ों की उम्र 15 से 35 साल के बीच होती है। स्किन ट्रांसप्लांटेशन के अभाव के चलते मरीज़ों व उनके परिजनों पर इसके गहरे आर्थिक व भावुक परिणाम देख‌ने को मिलते हैं। उचित समय पर की जाने वाले स्किन ग्राफ़्टिंग और सही चिकित्सा के चलते आग में झुलस जाने वाले मरीज़ों को कई तरह की जटिलताओं से बचाया जा सकता है और उचित तरीके से उनका पुनर्वास भी संभव होता है। उल्लेखनीय है कि स्किन डोनेशन का फ़ैसला किसी शख्स की मौत के 6 घंटे के भीतर किया जाना चाहिए। स्किन डोनेट करने के लिए दाता का स्थानीय स्किन बैंक के तहत पंजीकृत होना भी‌ आवश्यक होता है।

इस बेहद अहम मुद्दे पर बात करते हुए नेशनल बर्न्स सेंटर के‌ डायरेक्टर और प्लास्टिक सर्जन डॉ। सुनील केसवानी कहते हैं, “संभवत: 10 में से 1 व्यक्ति को ही स्किन डोनेशन अथवा स्किन डोनेशन की उचित प्रक्रिया की जानकारी होती है। जागरुकता की‌ इसी‌ कमी के चलते हर साल आग से झुलस जाने वाले मरीज़ों में से न्यूनतम मरीज़ों को ही स्किन‌ ट्रांसप्लांट का लाभ हासिल हो पाता है. यह एक बेहद गंभीर मसला है. इतना ही नहीं, मुम्बई में ही बर्न से जुड़े मामलों का आंकलन सही तरीके से नहीं किया जाता है जो इससे जुड़ी परेशानियों को और बढ़ा देता है । एक संस्थान के तौर पर हम ऐसे बर्न सरवाइवरों की ज़िंदगियों को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं । एक अर्से से हम साल-दर-साल लगभग 300 जागरुकता अभियानों का आयोजन करते आ रहे हैं ताकि बड़ी संख्या में लोग स्किन डोनेट करने के लिए प्रेरित हो सकें। हमें इस बात की पूरी उम्मीद है कि जागरुकता से जुड़े हमारे इन प्रयासों के चलते स्किन डोनेशन से संबंधी इस कमी को पूरा किया जा सकेगा और इसके बारे में लोगों की समझ में भी ख़ासा इज़ाफ़ा देखने को मिलेगा।”

बर्न सरवाइवर विराज ठाकुर कहते हैं, “एक कार्यस्थल पर हुए हादसे में मैं 43% तक आग में झुलस गया था । ऐसे में मेरे बचने की महज़ एक ही शर्त थी और वो थी सही समय पर मिलने वाला उपचार. स्किन‌ डोनेशन के बाद हुई स्किन ग्राफ़्टिंग के माध्यम से मेरी जान बच गयी थी । इसके लिए मैं डॉ. सुनील केसवानी और नैशनल बर्न्स सेंटर में कार्यरत पूरी मेडिकल टीम का आभारी हूं। मैं उन सभी अनाम नायकों, स्किन डोनरों का भी तहे दिल से शुक्रिया कहना चाहता हूं जिनके अमूल्य योगदान के चलते आज मैं जीवित हूं । इस मौके पर मैं अधिक से अधिक लोगों से गुज़ारिश करना चाहूंगा कि वो स्किन डोनेट करने के लिए आगे आएं जो मुझ जैसे आग में झुलस जाने वाले लोगों के लिए ज़िंदगी और मौत के बीच की अहम कड़ी बन सकें।”

ग़ौरतलब है कि जागरुकता अभियान को रोटरी क्लब ऑफ़ बॉम्बे नॉर्थ और रोटरी क्लब ऑफ़ देवनार का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। उल्लेखनीय है कि फ़ोरम को ज़ोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC), द रिजनल ऑर्गन ऐंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइज़ेशन (ROTTO), द सुमती ग्रुप, संडे फ़्रेंड्स, द मानवता चैरिटेबल फ़ाउंडेशन और द फ़ेडरेशन ऑफ़ बॉडी ऐंड ऑर्गन डोनेशन जैसी संस्थाओं की‌ ओर से भी ख़ासी मदद हासिल हुई ।

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